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Monday, 01 September, 2025

Caste Census India: जातीय जनगणना से बढ़ेगा आरक्षण की सीमा बढ़ाने का रास्ता

Caste Census India: केंद्र सरकार द्वारा घोषित जातीय जनगणना से आरक्षण की वर्तमान 50% सीमा पर पुनर्विचार का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। दशकों से सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा इस मांग में बाधा रही है, लेकिन अब ठोस आंकड़े न्यायिक मानकों को चुनौती देने का आधार बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की आरक्षण सीमा और उसका इतिहास

भारत में वर्षों से आरक्षण की सीमा 50% तक सीमित रही है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में तय किया था। इस फैसले में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर ओबीसी के लिए 27% आरक्षण को मंजूरी दी गई, लेकिन कुल आरक्षण सीमा 50% तय की गई, और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही इससे ऊपर जाने की अनुमति दी गई।

Caste Census India: कोर्ट के सामने बार-बार चुनौती, लेकिन हर बार आंकड़ों की मांग

राज्य सरकारों ने समय-समय पर 50% की सीमा से अधिक आरक्षण देने की कोशिशें कीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ठोस आंकड़ों की मांग करते हुए इन्हें अमान्य कर दिया।

2006 में एम. नागराज केस में कोर्ट ने एससी/एसटी को प्रमोशन में आरक्षण को वैध तो ठहराया, लेकिन तीन शर्तें रखीं: पिछड़ापन, प्रतिनिधित्व की कमी और प्रशासनिक दक्षता पर असर।

2018 के जर्नेल सिंह मामले में पिछड़ापन साबित करने की शर्त हटाई गई, लेकिन प्रतिनिधित्व और आंकड़ों की अनिवार्यता बरकरार रही।

मराठा और जाट आरक्षण की पहलें भी रहीं असफल

यूपीए सरकार द्वारा जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल करने और महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठा आरक्षण की पहल को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह 50% सीमा को पार करती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल केंद्र सरकार ही SEBC (सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग) की पहचान कर सकती है। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 342A में संशोधन कर राज्यों को यह अधिकार वापस दिया गया।

Caste Census India: आर्थिक आधार पर आरक्षण का नया अध्याय

2019 में केंद्र सरकार ने EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लिए संविधान संशोधन के जरिए 10% आरक्षण लागू किया। यह आरक्षण 50% सीमा से ऊपर था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इसे वैध ठहराते हुए कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण संवैधानिक है।

अब जातीय जनगणना से मिल सकते हैं ठोस आंकड़े

केंद्र सरकार की जातीय जनगणना वास्तविक सामाजिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व की स्थिति को सामने लाएगी। यदि इसमें यह सिद्ध होता है कि कुछ वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, तो इससे कोर्ट के निर्धारित मापदंडों को पूरा किया जा सकता है। यह आरक्षण प्रणाली को फिर से गढ़ने की संभावनाएं पैदा कर सकती है।

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